रविवार, 17 अक्तूबर 2010

रावण

आज शाम फ़िर रावण को जलाया जायेगा
बुराई का प्रतीक फ़िर एक बार मिटाया जायेगा

इतने बड़े विद्वान की कैसे मति भ्रष्ट हो गयी
क्षण भर के घमंड में जान ही चली गयी

सीता को छल से चोरी कर लाया
राह में गरुड़ को भी घायल कर आया

बहिन के प्यार में भगवन को नहीं पहचाना
न ही भाई के विवेक और हनुमान की शक्ति को माना

इतना बड़ा विद्वान ये कैसी भूल कर बैठा
क्रोध में अपनी सूझ बूझ भी खो बैठा

हो न हो ये राम की ही माया थी
हम सब के लिए रची ये गाथा थी

प्यार बना मोह तो अपरहण था बदले की भावना
शक्ति की मदहोशी लायी भगवन से लड़ने की कामना

क्रोध विनाशक हुआ तो बंधू बने दुश्मन
राम के साथ सभी थे, जुड़ गए और विभीषण

युद्ध तो कब का ख़त्म हुआ
और रावण का भी अंत हुआ

हम फ़िर भी हर वर्ष उसे क्यूँ जलाते हैं
अच्छाई की विजय का जश्न क्यूँ मनाते हैं

क्यूंकि कलयुग का आचरण ये कहता है
हम सब में आज भी रावण रहता है

बुद्धिमान हैं मगर भटके हुए हैं
अपने अपने स्वार्थों से लिपटे हुए हैं

एक बार अपने गुनाहों को जला कर देखें
आएने से नज़रें मिला कर तो देखें

सुबह का भूला शाम को घर आ जाए
पश्चाताप से सम्मान और भी बढ़ जाए

रामायण भी तो यही बताती है
दशेहरे के बाद ही दीवाली आती है

रावण ने राम को देर में पहचाना
वक्त है, तुम इतनी दूर मत चले जाना

अपने रावण को आज ज़रूर मारना
वरना इस बार दीवाली मत मनाना

1 टिप्पणी:

  1. wah wah! kya baat hai...cha gaye sir...deepawali mangal may ho!

    rahi baat ravan ki...
    toh, aji main toh kehta hoon, insan raha hoga, shayad, tabhi toh kamina, mohabbat kar baitha.
    Warna farishton ko kabhi dil dete suna hai kisi ne??? ;)

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