क्यूँ उठायें किसी पर उँगलियाँ, हर तरफ़ हैं गुनाहगार यहाँ
अपने अपने ईमान से सभी तो हैं बेईमान यहाँ
कभी होश में, कभी अनजाने में, बस खुदगर्ज़ी का ज़माना है
दामन किसी के मैले नहीं मगर दिल मिलते नहीं साफ़ यहाँ
दौलत का सारा खेल है और नियम सभी पहले से तय हैं
छोटे बनेंगे मुजरिम हमेशा और बड़े चोर कोतवाल यहाँ
इतिहास भी तो गवाह है, ये कौन सी नई बात है यारो
अमीरी तब भी राज करती थी, गरीबी आज भी सज़ा है यहाँ
सांच को आंच नहीं होती, बुजुर्गों से सुना करते थे
सच्चाई महज़ दीवानगी है, झूठ का है बस सहारा यहाँ
मयखाने में वो हमप्याला और तूफानों में टूटी हुई कश्ती
दोस्ती के नए गणित में दुश्मन नहीं ढूँढने पड़ते यहाँ
सभी को ऊपर बढ़ना है और दुनिया को नीचे रखना है
जन्नत में शायद नहीं मिले, हर कदम पर मिलते हैं खुदा यहाँ
ख़ुद से फुर्सत मिले तो कहीं और देखें लोग
दुनिया बड़ी है तो क्या हुआ, दायरे बहुत छोटे हैं यहाँ
गम तो सभी को है लेकिन परवाह किसी को नहीं है "राजीव"
राम राज्य नहीं है तो क्या हुआ, कलयुग की किसे है फ़िक्र यहाँ
मंगलवार, 26 जनवरी 2010
मक्तूब
जो लिखा है उसी को लिख दिया है
शुक्र है खुदा का उसने ये हुनर दिया है
वही आशार हैं और हैं दर्द भी वही
बस अंदाज़ ऐ बयान कुछ और है
ख़याल सभी शायर के हैं जुदा
अपना भी तमाशा कुछ और है
शुक्र है खुदा का उसने ये हुनर दिया है
वही आशार हैं और हैं दर्द भी वही
बस अंदाज़ ऐ बयान कुछ और है
ख़याल सभी शायर के हैं जुदा
अपना भी तमाशा कुछ और है
गुरुवार, 31 दिसंबर 2009
नया साल
उम्र से तजुर्बा नहीं होता, तजुर्बे से उम्र होती है
ज़िन्दगी सालों में नहीं, चंद लम्हों में बसर होती है
खुदा करे आपको ये लम्हे खूब मिलें
नए साल में नए तजुर्बे भी मिलें
जिनकी ख्वाहिश है बेपनाह आपको
वो लोग, वो राहें, वो मंज़र ज़रूर मिलें
ज़िन्दगी सालों में नहीं, चंद लम्हों में बसर होती है
खुदा करे आपको ये लम्हे खूब मिलें
नए साल में नए तजुर्बे भी मिलें
जिनकी ख्वाहिश है बेपनाह आपको
वो लोग, वो राहें, वो मंज़र ज़रूर मिलें
बुधवार, 25 नवंबर 2009
मुंबई
ज़रूर कुछ ख़ास है आसमान पर कोई नज़र आया है
झिलिमिल ऑंखें लिए चाँद आज मुस्कुराया है
पिछले कुछ दिनों में बिछ्ढ गए कई अपने पराये
देखो तो सभी को एक चेहरा नज़र आया है
भीगी एक आंख लगता है जैसे सुबक रही हो
बेवजह यूँ जुदा होने का मुकद्दर किसने बनाया है
कालिख असमान की मिट जायेगी, धुल जाएगा अँधेरा भी
कैसे भरेगा मगर वो घाव जो ताज की रूह पर लगाया है
किस से शिकायत करूँ इंसान क्यूँ दरिंदा हुआ "राजीव"
उसको भी तो आख़िर मेरे खुदा ने ही बनाया है
झिलिमिल ऑंखें लिए चाँद आज मुस्कुराया है
पिछले कुछ दिनों में बिछ्ढ गए कई अपने पराये
देखो तो सभी को एक चेहरा नज़र आया है
भीगी एक आंख लगता है जैसे सुबक रही हो
बेवजह यूँ जुदा होने का मुकद्दर किसने बनाया है
कालिख असमान की मिट जायेगी, धुल जाएगा अँधेरा भी
कैसे भरेगा मगर वो घाव जो ताज की रूह पर लगाया है
किस से शिकायत करूँ इंसान क्यूँ दरिंदा हुआ "राजीव"
उसको भी तो आख़िर मेरे खुदा ने ही बनाया है
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