बुधवार, 1 अगस्त 2012

कन्यादान

"तुलसी इस संसार में अब होता नहीं कन्यादान
कलयुग की नयी रीत में हो रहा है बालक दान I
हो रहा बालक दान, राम की महिमा न्यारी
मात पिता के सुख दुःख में बेटी है बेटे पर भारी II"

बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

जगजीत सिंह

ख़ुदा का शुक्र है मुझसे ये गुस्ताख़ी नहीं हुई
गुलज़ार साहब से पहले तुम्हरी नज़्म नहीं हुई
यकीनन उसकी मर्ज़ी थी जो आज बात बन गयी
उनकी नज़्म होते ही ख़यालों को सहर मिल गयी

ये क्या बात हुई कि तुम ख़ुदा को प्यारे हो गए हो
मेरी दुनिया से हमेशा के लिया विदा हो गए हो
वो ख़ुदा ही बताये तुम उसको कब प्यारे नहीं थे
वो जग जीत ही गए जिस जग को मोहने आये थे

कई महीने हो गए सुने की तुम यहाँ से चले गए
कुछ को अनाथ और कितनों को मायूस कर गए
अगर ये सच भी है तो इस बात का ग़म कैसे करूँ
ख़ुदा की मर्ज़ी के आगे फ़रियाद किस हक़ से करूँ

अपने जीते जी तुम्हारे होने की ख़ुशी कहीं ज़्यादा है
इसी ख्याल के सहारे तुम्हारे जाने का ग़म ज़रा कम है
शुक्रगुज़ार हूँ ख़ुदा का जो तुम्हें ज़मीन पर उतारा
कुछ वक़्त जो तुमने हम इंसानों के साथ गुज़ारा

तुम्हारे होने से ही ख़ुदा का यकीन पक्का हुआ
इस भरी दुनिया में कहने को कोई अपना हुआ
जब से होश संभाला है तुम्हारी आवाज़ ही सहारा है
तुम्हारी ग़ज़लें ही ज़िन्दगी का मक्ता और मिस्रा है

आवाज़ नहीं मरहम है, मेरी कायनात की सरगम है
ज़ख्म भर दे गुनगुना कर, किस दवा में ऐसा दम है
किसी नेक करम की दुआ होगी ज़माने भर के वास्ते
कोई हाल हो या हालात, तय हो जाते हैं सभी रास्ते

कभी दोस्त, कभी महबूबा, कभी गुरु और कभी ख़ुदा
कभी ख़ुशी, कभी ग़म, कभी महफ़िल और कभी तन्हा
हर रिश्ते, हर एहसास को मेरे ही ख़यालों से चुना जैसे
आवाज़, कलाम, मौसिकी के धागों से फिर बुना जैसे

अन्फोर्गेटएबल्स से हुई इब्तेदा में ये तय हो गया था
एक फ़रिश्ता इंसान बन कर ज़मीन पर उतर आया था
बात जो निकली है यकीनन बड़ी दूर तलक जाएगी
तेरी आवाज़ के सहारे ज़िन्दगी अच्छी गुज़र जाएगी

न विनायक को पहचानता, न ही शिव को ढूँढ पाता
न नारायण मिलते, न राम और कृष्ण को देख पाता
न माँ की ज्योती मिलती, न मिटता मन का अँधेरा
न मिलता गुरु का ज्ञान, न पूरी होती शाम, न सवेरा

मत पूछो मेरे क्या थे, पूछो क्या हो और रहोगे
आख़िरी दम तक मेरी साँसों में धड़कते रहोगे
तुम्हरी ग़ज़लों, नज़्मों, भजनों का गज़ब सहारा है
मुझे याद नहीं कोई भी दिन इनके बग़ैर गुज़ारा है

इस जहाँ में तो चाह कर भी मिल न पाया तुमसे
अपनी कोई नज़्म भी कभी कह न पाया तुमसे
फ़राज़ कहते हैं जो भी बिछड़े हैं, मिलते नहीं शायद
फिर भी तू इंतज़ार कर, हम कभी मिल सकें शायद

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

यह शिक्षा

यह शिक्षा कैम्पियन की तो नहीं हो सकती
डार्लिंग, यह शिक्षा फादर जो की नहीं हो सकती

आगे बढ़ कर, मदद कर के, दोस्ती का मान रखो
पीठ पीछे फायदा उठा कर, छल कपट का खेल खेलो

हर शक को बेबुनियाद बता कर, सच का ढोंग रच कर
सीना तान कर दोस्त के विश्वास से गन्दा खेल खेलो

और अचानक एक रोज़ रंगे हाथों पकडे जाने पर
घर से निकाल कर अपनी ताकत का पूरा खेल खलो

यह शिक्षा कैम्पियन की तो नहीं हो सकती
डार्लिंग, यह शिक्षा फादर जो की नहीं हो सकती

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

मेहमान

मुमकिन नहीं फ़िर क्यूँ हमें ये गुमान हो गया
चुपके इस आज कोई फ़िर दिल का मेहमान हो गया

ये जान तो एक मुद्दत से किसी और की अमानत है
बेखुदी में फ़िर हमसे ये कैसा गुनाह हो गया

अपनी आशिकी का हमसफर हमें हमेशा से अज़ीज़ है
फ़िर क्यूँ लगा जैसे एक हमराह और मिल गया

चंद लम्हों की राह थी कोई ख्वाबों की सहर तो नहीं
लगता है मगर उम्र भर का जैसे कोई रिश्ता हो गया

एक अरसा हुआ था हमें अपने साये से मिले
इस मोड़ पर अचानक फ़िर वो तन्हा मिल गया

खुशियाँ गर न मिलीं तो गम बहुत चले आयेंगे
सर रखने को शायद एक कंधा और मिल गया

मोहब्बत जागीर नहीं किसी की, इंसानी जज्बा है ये
भरी महफिल में क्यूँ हमारा नाम नीलाम हो गया

ज़माना तो ज़माने से दीवाना है इसका क्या ईमान
शिकायत के इसे बस एक बहाना और मिल गया

बहुत छोटी है ज़िन्दगी न जाने कब खुदा बुला ले
हमें याद करने को चलो एक आंसू और मिल गया

अजीब इत्तेफाक है कितनी मिलती है दास्ताँ हमारी
कुछ कहा नहीं किसी ने और कैसा ये इज़हार हो गया

कोई अफ़सोस नहीं उन्हें ये खयाल भी न आयें "राजीव"
खूबसूरत एक ग़ज़ल का हमें आज ख़याल मिल गया