शनिवार, 1 जनवरी 2011

नया साल मुबारक हो

बड़ों पर खीजने से पहले,
उनकी मोहब्बत का लिहाज़ हो.

छोटों को नसीहत से पहले,
उनकी छोटी उम्र का ख्याल हो.

बच्चों पर चिल्लाने से पहले,
अपने बचपन कि नादानी याद हो.

वजह बेवजह उलझने से पहले,
अपने इंसान होने का एहसास हो.

औरों पर ऊँगली उठाने से पहले,
दामन का दाग़ नज़र में हो.

नफरत कि आग में जलने से पहले,
ईमान और मोहब्बत से काम हो.

औकात किसी की आंकने से पहले,
वक़्त के खेल का सबब याद हो.

इन सब के साथ और ख़ुदा से पहले,
हर ग़रीब की हिफाज़त और सम्मान हो.

ख़ुदा से किसी शिकवे से पहले,
कुबूल हुई दुआओं का शुक्रिया अदा हो.

बस इतनी सी गुज़ारिश और दुआ से पहले,
आप सभी को नया साल मुबारक हो.

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

अपना ही अंश

जब चेहरे की खुशी गुम होने लगे
और आँखों में नमी ही रहने लगे
जब होठों पर मुस्कान रुकने से बचे
और खामोशी ढेरों बातें करने लगे
तुम दिल में झाँक कर देख लेना
कोई अपना ही अंश होगा जो दर्द से गुज़र रहा होगा
कोई अपना ही अंश होगा जो दर्द से गुज़र रहा होगा

जब किनारे तक पहुंचना मुश्किल लगे
और रस्ते में साँस टूटने लगे
जब दवा भी अपना काम न करे
और दुआओं पर शक होने लगे
तुम ख़ुद को हौसला देना मत भूलना
कोई अपना ही अंश होगा जो दर्द से गुज़र रहा होगा
कोई अपना ही अंश होगा जो दर्द से गुज़र रहा होगा

जब वक्त जैसे ठहरा सा लगे
और तारीखों का फ़िर भी हिसाब लगे
जब इंतज़ार हो सुबह की दस्तक का
और शाम के साए लिपटनें लगें
तुम चाँद को सूरज का पता दे देना
कोई अपना ही अंश होगा जो दर्द से गुज़र रहा होगा
कोई अपना ही अंश होगा जो दर्द से गुज़र रहा होगा

जब शिकवे शिकायत कहीं जुड़ने लगें
और मीठी यादों से उलझने लगें
जब प्यार और विश्वास की ज़रूरत हो
और मन के मैल उन्हें धोने लगें
तुम अपना हाथ बढ़ाना मत भूलना
कोई अपना ही अंश होगा जो दर्द से गुज़र रहा होगा
कोई अपना ही अंश होगा जो दर्द से गुज़र रहा होगा

जब दिल में धुक धुक होने लगे
और टीस का कोई पता न लगे
जब ज़ख्म का जिस्म पर निशान न हो
और दर्द से दामन भरने लगे
तुम उसको बाँहों में भर लेना
कोई अपना ही अंश होगा जो दर्द से गुज़र रहा होगा
कोई अपना ही अंश होगा जो दर्द से गुज़र रहा होगा

जब उम्मीद की किरण बुझने लगे
और आस के मोती बिखरने लगें
जब ज़िन्दगी बेईमानी करने लगे
और चुप चाप अलविदा कहने लगे
तुम दो कदम साथ बस दे देना
कोई अपना ही अंश होगा जो दर्द से गुज़र रहा होगा
कोई अपना ही अंश होगा जो दर्द से गुज़र रहा होगा

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

करवा चौथ

अगर दशरथ कैकई को न देते एक वचन
न राम को वनवास होता, न सीता का अपरहण
न मिलते हनुमान, न रास्ता भटकता रावण
न मनता दशेहरा, न दीवाली का पर्व पावन

मगर ये तो विधी का विधान था
एक अमावस का उजालों से उद्धार था
वाल्मिकी ने क्या खूब महाकाव्य रचा था
हर होनी को बड़ी बारीकी से गढा था

पर सीता से उनका बैर समझ नहीं आया
अग्नि परीक्षा के बाद भी उसे आज़माया
धोबी के कहने पर घर से निकलवाया
युवराजों का जन्म भी आश्रम में करवाया

वाल्मीकि के इस महाकाव्य में अजीब सा पक्षपात है
सीता ही क्यूँ हर अध्याय में अकेली और लाचार है
उसकी भक्ति का फल क्यूँ त्याग और बलिदान है
क्या यही मर्यादा पुरुषोत्तम का आधार है

वाल्मीकि इस महाकाव्य से अमर हो गए
सीता धरती में, राम जल में विलीन हो गए
बरसों बरस हम यही कहानी दोहराते रहे
अग्नि परीक्षा को नारी का गहना बताते रहे

रामायण को अब सीता की नज़र से लिखना होगा
वाल्मीकि के इस पक्षपात को हमें सुधारना होगा
स्वयम्वर तो फ़िर एक बार सीता का राम से ही होगा
करवा चौथ का व्रत बस अब से राम को रखना होगा

रविवार, 17 अक्टूबर 2010

रावण

आज शाम फ़िर रावण को जलाया जायेगा
बुराई का प्रतीक फ़िर एक बार मिटाया जायेगा

इतने बड़े विद्वान की कैसे मति भ्रष्ट हो गयी
क्षण भर के घमंड में जान ही चली गयी

सीता को छल से चोरी कर लाया
राह में गरुड़ को भी घायल कर आया

बहिन के प्यार में भगवन को नहीं पहचाना
न ही भाई के विवेक और हनुमान की शक्ति को माना

इतना बड़ा विद्वान ये कैसी भूल कर बैठा
क्रोध में अपनी सूझ बूझ भी खो बैठा

हो न हो ये राम की ही माया थी
हम सब के लिए रची ये गाथा थी

प्यार बना मोह तो अपरहण था बदले की भावना
शक्ति की मदहोशी लायी भगवन से लड़ने की कामना

क्रोध विनाशक हुआ तो बंधू बने दुश्मन
राम के साथ सभी थे, जुड़ गए और विभीषण

युद्ध तो कब का ख़त्म हुआ
और रावण का भी अंत हुआ

हम फ़िर भी हर वर्ष उसे क्यूँ जलाते हैं
अच्छाई की विजय का जश्न क्यूँ मनाते हैं

क्यूंकि कलयुग का आचरण ये कहता है
हम सब में आज भी रावण रहता है

बुद्धिमान हैं मगर भटके हुए हैं
अपने अपने स्वार्थों से लिपटे हुए हैं

एक बार अपने गुनाहों को जला कर देखें
आएने से नज़रें मिला कर तो देखें

सुबह का भूला शाम को घर आ जाए
पश्चाताप से सम्मान और भी बढ़ जाए

रामायण भी तो यही बताती है
दशेहरे के बाद ही दीवाली आती है

रावण ने राम को देर में पहचाना
वक्त है, तुम इतनी दूर मत चले जाना

अपने रावण को आज ज़रूर मारना
वरना इस बार दीवाली मत मनाना