शनिवार, 8 मार्च 2014

मोहब्बत

होती है दुनिया में, यकीनन मोहब्बत होती है
बस कम्बख्त इसकी उम्र बड़ी छोटी होती है

मचलती है, सुलगती है, दहकती है ज़ोर से
अपने पूरे शबाब पर महकती है पुरज़ोर से
अचानक ठहरती है, बिछड़ती है, बिखरती है
और बुझ कर ये फिर से आवारा भटकती है
... कम्बख्त इसकी उम्र बड़ी छोटी होती है

किसी अंजाने सफ़र में, कोई पहचाने रास्ते पर
बारिश कि फुहारों में, किसी सनसेट पॉइंट पर
ख़ामोशी से कभी छम छम कर के लिपटती है
ज़रा क़रीबी बढ़ते ही ये फिर दूर होने लगती है
... कम्बख्त इसकी उम्र बड़ी छोटी होती है

ढूंढती एक नज़र, झुक कर उठती एक नज़र
भरी भीड़ में रुक रुक कर जुड़ती एक नज़र
आँखों ही आँखों में हर कहानी शुरू होती है
उन्हीं आँखों के सैलाब में फिर ये डूबती है
... कम्बख्त इसकी उम्र बड़ी छोटी होती है

पल भर की, चंद लम्हों की या एक मौसम की
दिल की, रूह की, दर्द की या सिर्फ जिस्म की
कोई नीयत हो भूख सौ फ़ीसदी सच्ची होती है
कितनी भी छोटी हो मोहब्बत अच्छी होती है

होती है दुनिया में, यकीनन मोहब्बत होती है
बस कम्बख्त इसकी उम्र बड़ी छोटी होती है

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

मुलाक़ात

ये सोचा न था तुमसे फ़िर कभी मुलाक़ात होगी
बुझी हुई राख में दबी थोडी सी कहीं आग होगी

भीगा है मन, भीगी हैं यादें, भीगी भीगी है तन्हाई
कोहरा है बहुत अभी, आगे कहीं शायद रौशनी होगी

बहुत पुरानी है बात फ़िर कैसे हवाओं में वही खुशबू है
खबर नहीं ये कहानी कब शुरू हुई, कहाँ ख़त्म होगी

यूँ तो देखे हैं मौसम बहुत लेकिन नहीं जानते थे
एक रोज़ बिना बादल ऐसी ज़ोर की बरसात होगी

कभी ख्वाब हो, कभी राज़, कभी धूप तो कभी छाओं तुम
कौन है इस नकाब के पीछे, तुम्हारी कोई तो पहचान होगी

करूँ ऐतबार तुम्हारी आँखों का या ज़ख्मों का अपने
पता नहीं किस के अरमानों की इस बार कुर्बानी होगी

एक तरफ़ पूरी दुनिया और इस तरफ़ एक छोटा सा दिल
न जाने कौन मुस्कुराएगा और किस की रुसवाई होगी

दो अल्फाज़ नहीं जुड़ रहे थे कि एक ग़ज़ल मिल गई "राजीव"
ये मेरी तो हो नहीं सकती, ये ज़रूर तुम्हारी मोहब्बत होग

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

सभी सीखते रहे

कि हमारी ग़ल्तियों से सभी सीखते रहे और सज़ा हमें देते रहे
लहूलुहान देख कर भी वो हमारी ग़ल्तियों का इंतज़ार करते रहे

कोई भी नयी राह चुनोगे तो कुछ ग़ल्तियाँ हो ही जायेंगी
बेहद समझदार हैं वो, इसी लिये चार कदम पीछे चलते रहे

जानते हैं "इश्क़ आग़ का दरिया है, तैर के उस पार जाना है"
और वो किनारे पर खड़े हमारे जलने का इंतज़ार करते रहे

क्या सुनायें "राजीव" अपने तज़ुर्बों की ये कहानी अब तुम्हें
जितना भी हम सीखे, उससे कहीं ज़्यादा तो हम भुलाते रहे

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

तुम्हारी यादें

एक शाम जो मुझे नसीब हुईं तुम्हारी यादें
इस दिल को अज़ीज़ हो गयीं तुम्हारी यादें

पल भर भी तुम दूर नहीं फ़िर क्यूँ
तुम से ज़्यादा करीब हो गयीं तुम्हारी यादें

हर लम्हा तुम्हें याद करतें हैं फ़िर भी
कभी कम क्यूँ न हुईं तुम्हारी यादें

सावन की बूंदों में जब आंसू भी मिले
मेरी आँखों में भर आयीं तुम्हारी यादें

अजनबी चेहरों से भरी हर महफिल में
मुझे दोस्त बन कर मिल गयीं तुम्हारी यादें

तन्हा रातों में नींद मिल गई जो कभी
ख्वाबों की सहर पर मिल गयीं तुम्हारी यादें

वो हमराह हैं मेरी ये कुबूल है मगर
कभी हमसफर हो नहीं सकतीं तुम्हारी यादें

मोहब्बत की इस राह गुज़र में "राजीव"
तुम्हारी जगह ले नहीं सकतीं तुम्हारी यादें

रविवार, 24 मार्च 2013

ख़ूबसूरत लोग

कई ख़ूबसूरत लोगों के लिये अक्सर दुआ करता हूँ
इन्हें इसका आधा ही ख़ूबसूरत इंसान बनाया होता

ऐ ख़ुदा इन सभी को तूने सुन्दर सूरत के साथ साथ
इंसानी सीरत और तमीज़ का इल्म भी दिया होता

उस पर भी मुझसे क्या दुश्मनी थी आख़िर तेरी
कम से कम मेरा दोस्त रिश्तेदार न बनाया होता

शनिवार, 23 मार्च 2013

गधे को बाप बना ले

कहने को सभी को एक दूसरे ख्याल है
फिर भी ज़ेहन में बस रहा कोई मलाल है
आखिर खून है तो रंग कैसे न मिलेगा
जहाँ रिस रहा पीठ में लगा हर घाव है

गधे को अपना बाप बनाने की होड़ में
अपना उल्लू सीधा करने की जुगाड़ में
है कुछ इस तरह का आलम अब यहाँ
दिल में लगा खुदगर्ज़ी का बाज़ार है

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

रोहन

"ज़िन्दगी अचानक बहुत सारी गुज़र गयी
रोहन की बारवीं की परीक्षा ख़त्म हो गयी
अभी कल ही तो स्कूल में दाख़िल हुआ था
और देखो अब कॉलेज की तैयारी हो गयी"

शनिवार, 2 मार्च 2013

बंद करो

बहुत हुआ अब आग लगाना बंद करो
अपने ही घरों में सेंध लगाना अब बंद करो

अफवाहों को लगाम देने के साथ साथ
इधर की उधर करना अब बंद करो

ताश के पत्ते हैं और है केरम लूडो भी
छल कपट का खेल खेलना अब बंद करो


अपने दो टके के अहम् की जीत के लिए
अपने बच्चों का घर उजाड़ना अब बंद करो

प्यार मोहब्बत के अनमोल एहसासों को
खोटी अशर्फियों में तोलना अब बंद करो

खून में मिली नेतागिरी से देश संवारो
अपने ही खून से नेतागिरी अब बंद करो

घर के ही लोगों को छोटा बता कर
अपने कद का परचम लहराना अब बंद करो

नज़र आती हैं साफ़ चालाकियां तुम्हारी
बेकार में मुखोटे लगाना अब बंद करो

तुम को आदत होगी विष पीकर जीने की
अपनों के जीवन में ज़हर घोलना अब बंद करो

अगर मुमकिन नहीं ये तुमसे "राजीव"
बेलगाम घर से निकलना अब बंद करो

सोमवार, 14 जनवरी 2013

मकर संक्रांति

पिता का पुत्र से आज होगा मिलन
सूर्य देवता आयेंगे शनि के घर
ऋतू भी बदलेगी हेमंत से शिशिर
शुभ हो माघ मास का ये अवसर

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

कमाल करते हो यार

एक दोस्त मुश्किल में है
है अकेला और लाचार भी
बरसों पुराना यार है
सुख दुख का साथी भी
और तुम्हारे पास वक़्त नहीं
कंधे पर रखने को हाथ नहीं
क्या बात करते हो यार
तुम भी कमाल करते हो यार

तुमको पता है बड़ा खुद्दार है
पहचान है उसका स्वाभिमान भी
ज़िन्दगी की सबसे कठिन घडी है
मांगेगा नहीं मगर वो मदद भी
और तुम अजीब दलीलें देते हो
कि उससे बात करने से डरते हो
क्या बात करते हो यार
तुम भी कमाल करते हो यार

सब पर बुरा वक़्त गुज़रता है
रहता है कभी ज़्यादा देर भी
दुआओं में गज़ब का असर है
बढ़ जाता है उससे हौसला भी
और तुम ये बात नहीं सोच पाए
सहारे के लिए बस पैसे जोड़ पाए
क्या बात करते हो यार
तुम भी कमाल करते हो यार

पूछते हो उससे क्या हाल है
टटोलते हो उसकी नब्ज़ भी
कहता है वो सब ठीक है
करता है कुछ संकोच भी
और पास नहीं ये लव्ज़ तुम्हारे
डरना मत मैं हूँ साथ तुम्हारे
क्या बात करते हो यार
तुम भी कमाल करते हो यार

ये अधुनिक दुनिया बड़ी कमाल है
फ़टाफ़ट सिमट जाती हैं दूरियां भी
गुफ्तगू करना तो बड़ा आसान है
चाहिए नीयत और सही वक़्त भी
और तुम से इतना सा नहीं हुआ
जुम्मे के जुम्मे एक फ़ोन नहीं हुआ
क्या बात करते हो यार
तुम भी कमाल करते हो यार

अपने हालात पर वो ख़ुद हैरान है
पूछता है ख़ुदा से ये सवाल भी
सितारों की अबके कैसी अन बन है
कि गुम गए सारे सहारे भी
और तुम ये भी नहीं कर सकते
दो कदम साथ नहीं चल सकते
क्या बात करते हो यार
तुम भी कमाल करते हो यार

तुम को भी तो जांचा परखा है
करीब से महसूस की है दोस्ती भी
धीरे धीरे दिल का दरवाज़ा बंद हुआ है
खुलती नहीं अब कोई खिड़की भी
और तुम ये कभी देख नहीं पाए
कितने आंसू खोये कितने ज़ख्म पाए
क्या बात करते हो यार
तुम भी कमाल करते हो यार

मसरूफ हो बहुत सारा काम है
हैं कई सारी ज़िम्मेदारीयां भी
उसके शहर भी जाना होता है
जुड़े हैं वहां पचास काम भी
और तुम उससे शिकायत करते हो
कि अपना दर्द क्यूँ नहीं बाँटते हो
क्या बात करते हो यार
तुम भी कमाल करते हो यार

मिलते भी हो तो वक़्त कहाँ है
चाहिए मय और मयखाना भी
एक मुसाफिर प्यासा बैठा है
कहना है उसे अपनी कहानी भी
और तुम को ख़ुद से फुर्सत कहाँ
उसकी ख़ामोशी सुनने का मन कहाँ
क्या बात करते हो यार
तुम भी कमाल करते हो यार

अपनी काबलियत पर पूरा भरोसा है
कायम है वहीँ उसका ईमान भी
मेहनत करके ही पैसे कमाना है
नहीं चाहिए उधार का एहसान भी
और तुम मोल आंकने से कतराते हो
अपने दोस्त के लिए हिचकिचाते हो
क्या बात करते हो यार
तुम भी कमाल करते हो यार

चाहो तो सब कुछ हो सकता है
हो सकती है दिल कि बात भी
चेहरे के नकाब बस उतरना है
जम जाएगी फिर महफ़िल भी
और तुम उसके दायरे देख कर
चलते हो अपना दायरा खींच कर
क्या बात करते हो यार
तुम भी कमाल करते हो यार

चलो मान भी लिया कि वो ज़िद्दी है
बांटेगा नहीं कभी अपने दर्द भी
तुम्हारा तो अब भी ख़ास दोस्त है
लगी है तुम्हें उसकी फिक्र भी
और तुम अपना हाथ नहीं बढ़ा पाए
ऐसे वक़्त भी आगे नहीं बढ़ पाए
क्या बात करते हो यार
तुम भी कमाल करते हो यार

हालात देख कर अंदाज़ा लगता है
कहती है उसकी परेशानी भी
फिर भी हमेशा मुस्कुराता रहता है
खिलखिलाती रहती है हंसी भी
और तुम उसकी आवाज़ नहीं परख पाए
अपनी तल्लीनता से नहीं निकल पाए
क्या बात करते हो यार
तुम भी कमाल करते हो यार

कहते हो अकेलेपन में दम घुटता है
डूब जाता है अक्सर हौसला भी
आँखों के सामने जब किनारा डूबता है
भारी पढता है ये सदमा भी
और तुम बुलाने पर भी नहीं आये
अपनी चिंता को बांटने नहीं आये
क्या बात करते हो यार
तुम भी कमाल करते हो यार

तुमसे अब भी नहीं कुछ मांगता है
करता नहीं कोई शिकवा शिकायत भी
दोस्ती का आज कल यही दस्तूर है
निभाता है बराबर वो रस्म भी
और तुम हो कि उससे डरते हो
गले लगा कर क्यूँ नहीं कहते हो
क्या बात करते हो यार
तुम भी कमाल करते हो यार

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

महादेव

तुलसी इस संसार में देवों के देव महादेव पधारे हैं
अपनी पूरी कहानी फिर सुनाने महादेव पधारे हैं
हर शाम अपनी महिमा से संसार को मोह लेने
और पूरे परिवार को साथ जोड़ने महादेव पधारे हैं

यूँ तो बड़े, बूढ़े, बच्चे, जवान सभी उन पर रीझे हैं
महिलाओं के मन उन पर खास तौर से ही रीझे हैं
वैसे भी एक अच्छे वर का वही तो देते हैं वरदान
इस बार मगर स्त्रियों के मन महादेव पर ही रीझे हैं

शरीर पर भस्म, रुद्राक्ष और शेर की खाल लपेटे हुए
हाथ में त्रिशूल, डमरू और गले में सर्प लपेटे हुए
अपनी भोली मुस्कान के साथ ऐसा जादू है कर दिया
महिलाऐं घूम रही हैं उन्हें ख्वाबों ख्यालों में लपेटे हुए

मनुष्य के जिस शरीर में महादेव ने खुद को रचा है
सभी महिलाओं को वो शरीर अंग अंग खूब रचा है
पार्वती की जगह खुद को महादेव के संग सोच कर
कैलाश से धरती तक उनसे मिलन का स्वांग रचा है

रविवार, 9 सितंबर 2012

ठाकरे

पाकिस्तान को ठीक कर देंगे, अमेरिका चीन को ठीक कर देंगे
बिहार और यू पी को ठीक कर देंगे, पूरे देश को ठीक कर देंगे
कहता है ये ठाकरे परिवार का मुखिया, बेटा, पोता, भतीजा
'हमारा बस चले तो पूरी दुनिया को मराठी माणूस कर देंगे'

विश्वास नहीं होता पिछली तीन पीढ़ी से इनका यही राग है
दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गयी मगर इनका बस यही राग है
शेर की ख़ाल में छुपे इस रट्टू तोते की यही है असली कहानी
सियासत हो या हो विपक्ष की कुर्सी, हर हाल में यही राग है

पिछले तीस साल में तुम इतना सा काम नहीं कर पाए
मुंबई में लोकल ट्रेन की भीड़ के हालात नहीं सुधार पाए
आखिर किस मूंह से कहते हो इस देश को ठीक कर दोगे
तुम तो अपने वोट बैंक का जीवन यापन नहीं सुधार पाए

अगर इतना ही ताकत है बाजुओं में तो मैदान में आओ
ज्यादा नहीं बस ज़रा से दो काम मुंबई में कर के दिखाओ
ऑटो सही मीटर से चलवाओ, जहाँ जाना हो वहां चलवाओ
और इस शहर से गन्दगी का नामो निशाँ मिटा कर दिखाओ

भाई भतीजावाद में सिर्फ कुर्सियों के लिए हाथ न मिलाओ
मिल कर मुंबई को दुनिया का सबसे खूबसूरत शहर बनाओ
मुझे यकीन है तुम्हारे एक इशारे पर ये काम मुमकिन है
अपनी संस्थाओं को एकता और अखंडता का पाठ पढाओ

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

डाक्टरी

तुलसी इस संसार में डाक्टर की है महिमा न्यारी
इलाज के नाम पर क्या खूब चल रही दुकानदारी
चल रही दुकानदारी, आसानी से दवा नहीं मिलती
डाक्टर की तय दुकान के सिवाय कहीं नहीं मिलती

एक डाक्टर दूसरे का बताया इलाज नहीं मानता
कोई टेस्ट, कोई रिपोर्ट, कोई बात ही नहीं मानता
बात ही नहीं मानता, न समझता किसी की मजबूरी
मरीज की जेब काट कर भर रहा है अपनी तिजोरी

समाज के हर पहलू की तरह ये भी भ्रष्ट हो गया है
सबसे कुलीन कार्य, व्यापार और धंधा बन गया है
धंधा बन गया है, बिक रही है कौड़ियों में शर्म सारी
चिकित्सकों की लालसा है देश की सबसे बड़ी बीमारी

बुधवार, 1 अगस्त 2012

कन्यादान

"तुलसी इस संसार में अब होता नहीं कन्यादान
कलयुग की नयी रीत में हो रहा है बालक दान I
हो रहा बालक दान, राम की महिमा न्यारी
मात पिता के सुख दुःख में बेटी है बेटे पर भारी II"

बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

जगजीत सिंह

ख़ुदा का शुक्र है मुझसे ये गुस्ताख़ी नहीं हुई
गुलज़ार साहब से पहले तुम्हरी नज़्म नहीं हुई
यकीनन उसकी मर्ज़ी थी जो आज बात बन गयी
उनकी नज़्म होते ही ख़यालों को सहर मिल गयी

ये क्या बात हुई कि तुम ख़ुदा को प्यारे हो गए हो
मेरी दुनिया से हमेशा के लिया विदा हो गए हो
वो ख़ुदा ही बताये तुम उसको कब प्यारे नहीं थे
वो जग जीत ही गए जिस जग को मोहने आये थे

कई महीने हो गए सुने की तुम यहाँ से चले गए
कुछ को अनाथ और कितनों को मायूस कर गए
अगर ये सच भी है तो इस बात का ग़म कैसे करूँ
ख़ुदा की मर्ज़ी के आगे फ़रियाद किस हक़ से करूँ

अपने जीते जी तुम्हारे होने की ख़ुशी कहीं ज़्यादा है
इसी ख्याल के सहारे तुम्हारे जाने का ग़म ज़रा कम है
शुक्रगुज़ार हूँ ख़ुदा का जो तुम्हें ज़मीन पर उतारा
कुछ वक़्त जो तुमने हम इंसानों के साथ गुज़ारा

तुम्हारे होने से ही ख़ुदा का यकीन पक्का हुआ
इस भरी दुनिया में कहने को कोई अपना हुआ
जब से होश संभाला है तुम्हारी आवाज़ ही सहारा है
तुम्हारी ग़ज़लें ही ज़िन्दगी का मक्ता और मिस्रा है

आवाज़ नहीं मरहम है, मेरी कायनात की सरगम है
ज़ख्म भर दे गुनगुना कर, किस दवा में ऐसा दम है
किसी नेक करम की दुआ होगी ज़माने भर के वास्ते
कोई हाल हो या हालात, तय हो जाते हैं सभी रास्ते

कभी दोस्त, कभी महबूबा, कभी गुरु और कभी ख़ुदा
कभी ख़ुशी, कभी ग़म, कभी महफ़िल और कभी तन्हा
हर रिश्ते, हर एहसास को मेरे ही ख़यालों से चुना जैसे
आवाज़, कलाम, मौसिकी के धागों से फिर बुना जैसे

अन्फोर्गेटएबल्स से हुई इब्तेदा में ये तय हो गया था
एक फ़रिश्ता इंसान बन कर ज़मीन पर उतर आया था
बात जो निकली है यकीनन बड़ी दूर तलक जाएगी
तेरी आवाज़ के सहारे ज़िन्दगी अच्छी गुज़र जाएगी

न विनायक को पहचानता, न ही शिव को ढूँढ पाता
न नारायण मिलते, न राम और कृष्ण को देख पाता
न माँ की ज्योती मिलती, न मिटता मन का अँधेरा
न मिलता गुरु का ज्ञान, न पूरी होती शाम, न सवेरा

मत पूछो मेरे क्या थे, पूछो क्या हो और रहोगे
आख़िरी दम तक मेरी साँसों में धड़कते रहोगे
तुम्हरी ग़ज़लों, नज़्मों, भजनों का गज़ब सहारा है
मुझे याद नहीं कोई भी दिन इनके बग़ैर गुज़ारा है

इस जहाँ में तो चाह कर भी मिल न पाया तुमसे
अपनी कोई नज़्म भी कभी कह न पाया तुमसे
फ़राज़ कहते हैं जो भी बिछड़े हैं, मिलते नहीं शायद
फिर भी तू इंतज़ार कर, हम कभी मिल सकें शायद

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

यह शिक्षा

यह शिक्षा कैम्पियन की तो नहीं हो सकती
डार्लिंग, यह शिक्षा फादर जो की नहीं हो सकती

आगे बढ़ कर, मदद कर के, दोस्ती का मान रखो
पीठ पीछे फायदा उठा कर, छल कपट का खेल खेलो

हर शक को बेबुनियाद बता कर, सच का ढोंग रच कर
सीना तान कर दोस्त के विश्वास से गन्दा खेल खेलो

और अचानक एक रोज़ रंगे हाथों पकडे जाने पर
घर से निकाल कर अपनी ताकत का पूरा खेल खलो

यह शिक्षा कैम्पियन की तो नहीं हो सकती
डार्लिंग, यह शिक्षा फादर जो की नहीं हो सकती

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

मेहमान

मुमकिन नहीं फ़िर क्यूँ हमें ये गुमान हो गया
चुपके इस आज कोई फ़िर दिल का मेहमान हो गया

ये जान तो एक मुद्दत से किसी और की अमानत है
बेखुदी में फ़िर हमसे ये कैसा गुनाह हो गया

अपनी आशिकी का हमसफर हमें हमेशा से अज़ीज़ है
फ़िर क्यूँ लगा जैसे एक हमराह और मिल गया

चंद लम्हों की राह थी कोई ख्वाबों की सहर तो नहीं
लगता है मगर उम्र भर का जैसे कोई रिश्ता हो गया

एक अरसा हुआ था हमें अपने साये से मिले
इस मोड़ पर अचानक फ़िर वो तन्हा मिल गया

खुशियाँ गर न मिलीं तो गम बहुत चले आयेंगे
सर रखने को शायद एक कंधा और मिल गया

मोहब्बत जागीर नहीं किसी की, इंसानी जज्बा है ये
भरी महफिल में क्यूँ हमारा नाम नीलाम हो गया

ज़माना तो ज़माने से दीवाना है इसका क्या ईमान
शिकायत के इसे बस एक बहाना और मिल गया

बहुत छोटी है ज़िन्दगी न जाने कब खुदा बुला ले
हमें याद करने को चलो एक आंसू और मिल गया

अजीब इत्तेफाक है कितनी मिलती है दास्ताँ हमारी
कुछ कहा नहीं किसी ने और कैसा ये इज़हार हो गया

कोई अफ़सोस नहीं उन्हें ये खयाल भी न आयें "राजीव"
खूबसूरत एक ग़ज़ल का हमें आज ख़याल मिल गया

शनिवार, 12 नवंबर 2011

ये दोस्ती

क्या कहूं दोस्ती के मायने क्या हो गए हैं
फेस बुक पर हैं और ज़िन्दगी से लापता हो गए हैं

ज़माने के बदलते तौर तरीकों के मद्दे नज़र
कुछ अजनबी और कुछ सौदागर हो गए हैं

अच्छे होते हैं बेकारी और मुफलिसी के दिन
बड़े बड़े फ़कीर दोस्ती के बारे में कह गए हैं

ज़रा सी मुलाक़ात तोल मोल में बदल जाती है
किससे कितने फायदे और नुक्सान हो गए हैं

सीधी सीधी बातें ओढती हैं सियासती लिबास
अलफ़ाज़ तो अलफ़ाज़, इरादे भी बदल गए हैं

दोस्त और दोस्ती के जाने पहचाने रास्ते थे
बीवी बच्चों के साथ अब नए दोस्त जुड़ गए हैं

गुज़रे सालों का हिसाब अब यादों से नहीं होता
हैसियत और काबलियत नए मापदंड हो गए हैं

दोस्तों की कामयाबी के जश्न को वक़्त कहाँ
खुद की तारीफ़ में इतने मसरूफ हो गए हैं

भागती दौड़ती ज़िन्दगी में मिलते हैं कभी
शुक्र है खुदा का इतने तो करीब रह गए हैं

न खुशियों का रिश्ता है अब कोई, न ग़म का
पैमानों पर बस कीमत के लेबल लग गए हैं

स्कूल कॉलेज की महफिलों में ज़रा सांस लेते ही
कार और कारोबार के हिसाब लगने लग गए हैं

क्या लाये हो और क्या ले जाओगे यहाँ से
गीता के ज्ञान के मायने क्या से क्या हो गए हैं

ईर्ष्या द्वेष छल कपट फायदा नुक्सान पढ़ा नहीं था
दुनियादारी की शिक्षा में कितने विद्वान हो गए हैं

दौलत का नशा सबसे गाडा और नशीला है "राजीव"
दोस्ती की कहानी के किरदार इस रंग में डूब गए हैं

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

शराब

बुरा हो शराब का मेरी ज़िन्दगी यूँ बदल दी
ऐसी छूटी मूंह से, मेरे यार ने नज़र बदल दी

उसकी आगोश में कितना अज़ीज़ लगता था
वजह बेवजह खूब गुफ्तगू किया करता था
रात की ख़ामोशी को ठहाकों से चीरता था
घन्टे दो घन्टे के लिए सच बोला करता था
मेरा दोस्त इसी बहाने फ़ोन कर लिया करता था

जबसे शराब को तलाक़ दे आया है
जाने क्या मर्ज़ लगाया है
साला अजीब होश में आया है
पता नहीं किस बात से घबराया है
मुद्दतें हुईं उसने फ़ोन नहीं लगाया है

फिर एक रोज़ कमबख्त मुझसे छूट गयी
मानों जैसे एक और क़यामत हो गयी
अचानक सारी तमीज़ तहज़ीब लुट गयी
दुनियादारी की जैसे हर रस्म छूट गयी
तन्हाई दौड़ कर मुझसे लिपट गयी

कल तक जो साथ था वो दूर हो गया
दोस्तों से भरा काफिला यूँ गुम हो गया
महफिलों का भी जनाज़ा निकल गया
कहने सुनने को कोई बाकि नहीं रह गया
बगैर शराब ज़िन्दगी का मोल नहीं रह गया

बुरा हो शराब का मेरी ज़िन्दगी यूँ बदल दी
ऐसी छूटी मूंह से, मेरी कायनात ही बदल दी

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

मेरी बज़्म

मेरी बज़्म में जो चाहने वाले आये हैं
वही तो मेरे कलाम का मोल बढ़ाये हैं
शुक्रगुज़ार हूँ सभी का मैं तहे दिल से
वो जो हो गए अपने और जो अपने हैं

कुछ कमाल के चाहने वाले आये हैं
भरी महफ़िल में चेहरा छुपाये हैं
खुदा ने इतनी अच्छी शक्ल बक्शी है
न जाने किस बात से मूंह छुपाये हैं

कुछ अपना नाम तक बताते नहीं हैं
तारीफ़ मगर ज़रूर करते रहते हैं
किस बात का खौफ़ है न जाने इनको
इस महफ़िल से तारुफ़ नहीं करते हैं

और फिर कुछ मेरे ख़ास दोस्त हैं
फ़ोन या ई-मेल पर दाद देते हैं
जिनको होना चाहिए मेरी बज़्म में
वही छुप छुप कर वाह वाह करते हैं

शुक्रिया सभी का, सभी चाहने वाले हैं
अपने अपने मिजाज़ से लुत्फ़ उठाये हैं
शुक्र है किसी न किसी बहाने 'राजीव'
तेरी बज़्म में तेरा कलाम पढने आये हैं